Wednesday, 9 January 2013

जिन्हें नाज है हिन्द पर वो कहाँ हैं

जिन्हें नाज है हिन्द पर वो कहाँ हैं

ये कूचे ये नीलम घर दिलकशी के
ये लुट ते हुए कारवां ज़िन्दगी के
कहाँ हैं, कहाँ हैं मुहाफ़िज़ खुदी के?
जिन्हें नाज है हिन्द पर वो कहाँ हैं?
कहाँ हैं,  कहाँ हैं,  कहाँ हैं?

ये पुरपेच गलियाँ, ये बदनाम बाज़ार,
ये गुमनाम राही, ये  सिक्कोंकी झंकार 
ये इस्मत के सौदे, ये सौदों पे तकरार
जिन्हें नाज है हिन्द पर वो कहाँ हैं?
कहाँ हैं कहाँ हैं कहाँ हैं?

ये सदियों से बेख़ौफ़ सहमी सी गलियाँ
ये मसली हुई अधखुली ज़र्द कलियाँ
ये बिकती हुई खोकली रंग-रलियाँ
जिन्हें नाज है हिन्द पर वो कहाँ हैं?
कहाँ हैं,  कहाँ हैं,  कहाँ हैं?

वो उजले दरीचों में पायल की छन छन
थकी हारी साँसों पे तबले की धन धन
ये बे-रूह कमरों में खांसी की ठन ठन
जिन्हें नाज है हिन्द पर वो कहाँ हैं?
कहाँ हैं,  कहाँ हैं,  कहाँ हैं?

ये फूलों के गजरे, ये पीकों के छींटे
ये बे-बाक़ नज़रें, ये गुस्ताख़ फ़िक़रे
ये ढलके बदन और ये बीमार चेहरे
जिन्हें नाज है हिन्द पर वो कहाँ हैं?
कहाँ हैं,  कहाँ हैं,  कहाँ हैं?

यहाँ पीर भी आ चुके हैं, जवाँ भी
तनूमंद बेटे भी, अब्बा मियाँ भी
ये बीवी भी है और बेहन भी है माँ  भी
जिन्हें नाज है हिन्द पर वो कहाँ हैं?
कहाँ हैं,  कहाँ हैं,  कहाँ हैं?

मदद चाहती है ये हव्वा की बेटी 
यशोदा की हम-जींस राधा की बेटी
पयम्बर की उम्मत जुलेखा की बेटी
जिन्हें नाज है हिन्द पर वो कहाँ हैं?
कहाँ हैं,  कहाँ हैं,  कहाँ हैं?

ज़रा मुल्क के रेह्बरो को बुलाओ
ये कूचे ये गलियाँ ये मंज़र दिखाओ
जिन्हें नाज है हिन्द पर उनको लाओ
जिन्हें नाज है हिन्द पर वो कहाँ हैं?
कहाँ हैं कहाँ हैं कहाँ हैं?


फिल्म: प्यासा
गीत: साहीर लुधयानवी
संगीत: एस डी बर्मन
गायक: रफ़ी

1957


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