चक्रव्यूह में घुसने से पहले, कौन था मैं और कैसा था,
ये मुझे याद ही ना रहेगा
चक्रव्यूह में घुसने के बाद
मेरे और चक्रव्यूह के बीच सिर्फ़ जानलेवा निकटता थी,
इसका मुझे पता ही नहीं चलेगा
चक्रव्यूह से बाहर निकलने पर
मैं मुक्त हो जाउँ भले ही
फिर भी चक्रव्यूह की रचना में
फ़र्क ही ना पड़ेगा
मरू या मारू, मारा जाऊं या जान से मार दूँ
इसका फ़ैसला कभी नाहो पायेगा
सोया हुआ आदमी जब नींद से
उठकर चलना शुरू करता है
तब सपनोंका संसार उसे
फिर से दिख नहीं पायेगा
उस रोशनी में, जो निर्णय की रोशनी है
सब कुछ समान होगा क्या?
एक पलड़े में नपुंसकता और
दुसरे पलड़े में पौरुष्य
और ठीक तराजू के कांटे पर अर्धसत्य
अर्धसत्य, हादरवून टाकणारा सिनेमा. कथा-पटकथा-संवाद-अभिनय अशा सगळ्याचं पातळ्यांवर हा सिनेमा अंगावर काटा आणतो. इथला नायक पोलिस असूनही दहा-दहा गुंडांना लोळवत नाही, उलट लाचार वाटून नायिकेसमोर अगदी रडवेलाही होतो. ओम पुरीने रंगवलेला 'अनंत' आणि स्मिता पाटीलने रंगवलेली 'जोत्स्ना' बघताना अस्वस्थ व्हायला होतं. अर्धसत्य मनात घर करून जातो.
फिल्म: अर्धसत्य
कविता: दिलीप चित्रे
कथा: एस. डी. पानवलकर
पटकथा: विजय तेंडुलकर
दिग्दर्शक: गोविंद निलहानी
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